“कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की, जहाँ आपकी शारीरिक या मानसिक स्थिति आपकी काबिलियत के आगे बिल्कुल मायने न रखे। जहाँ ‘दिव्यांग’ शब्द की जगह ‘कुशल’, ‘स्वावलंबी’ और ‘हुनरमंद’ जैसे शब्द लिए जाएँ। यह कोई सपना नहीं, बल्कि जय शारदा एनजीओ के प्रकल्प ‘सेवालय‘ की बुनियादी सोच है। 2024 में शुरू हुए इस अनोखे प्रयास का मकसद उन बच्चों को नया जीवन देना है, जिन्हें उनके अपने ही परिवार वाले रखने में असमर्थ हैं। यहाँ उन्हें सिर्फ पनाह नहीं मिलती, बल्कि आत्मनिर्भर बनने का ‘मौका’ मिलता है।”
सेवालय: एक ऐसा घर जो स्कूल भी है
सेवालय की शुरुआत केवल लड़कों के लिए हुई थी। लेकिन जैसे-जैसे लोगों को इस मिशन की अहमियत समझ में आई और समर्थन बढ़ा, यहाँ लड़कियों को भी शामिल किया गया। आज लगभग 26 बच्चे सेवालय की छत्रछाया में न सिर्फ रह रहे हैं, बल्कि जीवन जीने के नए हुनर सीख रहे हैं।

ये बच्चे वो हैं जिनके लिए उनका अपना घर भी एक सपना था। सेवालय उन्हें वो घर देता है, जहाँ वे सुरक्षित हैं, और वह स्कूल भी, जहाँ वे अपना भविष्य खुद गढ़ना सीखते हैं।
हुनर वही, जो जीवन बदल दे: कौन क्या सीख रहा है?
सेवालय की टीम इन बच्चों को वो हुनर सिखा रही है, जो न सिर्फ उन्हें आत्मनिर्भर बनाएँगे, बल्कि समाज में उनका गौरवपूर्ण स्थान भी तय करेंगे:
· सिलाई-बुनाई, ऐपण (पारंपरिक हस्तकला)
· कुकिंग (रसोई का काम)
· ब्यूटी केयर और पार्लर स्किल
· फर्नीचर बनाना (कारपेंट्री)
· कंप्यूटर की बुनियादी शिक्षा
· और भी बहुत कुछ…



इन हुनरों के जरिए ये बच्चे यह साबित कर रहे हैं कि अगर मौका दिया जाए, तो वे किसी से कम नहीं हैं।
वो चेहरे जिन्होंने इस सपने को सँजोया (The Guiding Force)
हर बड़े बदलाव के पीछे कुछ ऐसे दिल होते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के समर्पित हो जाते हैं। सेवालय के पीछे भी ऐसे ही कुछ समर्पित चेहरे हैं:
· नीमा बिष्ट जी
· रोहित जोशी जी (संस्थापक)
· दीपा जी
· निर्मला पंत जी
· मीनाक्षी पांडे जी
· भावना जोशी जी
· यामिनी बिष्ट जी
इन सभी का योगदान इस मिशन की रीढ़ है। खासतौर पर रोहित जोशी जी की कहानी पूरे प्रोजेक्ट को एक नई प्रेरणा देती है।
रोहित जोशी जी: एक सरकारी नौकरी छोड़, एक जीवन का मिशन चुनना
रोहित जी खुद एक सरकारी नौकरी में थे – वो नौकरी जिसे समाज “आराम की जिंदगी” का पर्याय मानता है। लेकिन उन्होंने वो आराम छोड़ दिया। क्यों? क्योंकि उन्होंने इन बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा को अपने करियर से ऊपर रखा।

उनका मानना है कि शायद स्वयं भगवान ने ही उन्हें इन बच्चों की ज़िम्मेदारी सौंपी है। उनका एक ही सपना है: हर बच्चे के नाम से ‘बेचारा’ शब्द हट जाए। वे चाहते हैं कि हर बच्चा:
· अपने हुनर के बल पर खुद कमाए।
· काबिल बने।
· भीख न माँगे।
· किसी के भरोसे न रहे।
· और इंतज़ार न करे कि सरकार कब उनके लिए कुछ करेगी।
उनकी नज़र में, ये बच्चे वो दुनिया देख सकें, जो आज एक आम इंसान देख रहा है। बस, ज़रूरत है तो बस एक मौके की। और सेवालय वही मौका बनकर आया है।
निष्कर्ष: आप भी बन सकते हैं इस बदलाव का हिस्सा
सेवालय सिर्फ एक प्रकल्प नहीं, एक सोच है, एक आंदोलन है। यह हमें यह याद दिलाता है कि हर इंसान, चाहे उसकी परिस्थितियाँ कुछ भी हों, सम्मान और अवसर का हकदार है।
अगर आप भी काम में अपना योगदान देना चाहते हैं – चाहे वह धन से हो, समय से हो, कौशल सिखाने से हो, या सिर्फ इस संदेश को फैलाने से – तो जय शारदा एनजीओ और सेवालय प्रकल्प से जुड़ सकते हैं।
आइए, मिलकर एक ऐसे समाज की नींव रखें, जहाँ ‘दिव्यांग’ नहीं, ‘दिव्य हुनर’ वाले बच्चे पैदा हों।
हमारे साथ जुड़ें: एक वालंटियर के रूप में
· ✅ क्यों जुड़ें? एक ठोस सामाजिक बदलाव का हिस्सा बनें।
· ✅ कौन जुड़ सकता है? कोई भी (विद्यार्थी, गृहणी, प्रोफेशनल, रिटायर्ड) जिसके पास समय और सेवा की भावना हो।
· ✅ कैसे योगदान दे सकते हैं? अपने हुनर सिखाकर, बच्चों के साथ समय बिताकर, आयोजनों में मदद करके।
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